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बुधवार, 6 मार्च 2013

"बूढ़ी ग़ज़ल-हास्य" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बुड्ढों के हैं ढंग निराले
बूढ़े हैं ज़वान दिल वाले

आये जवानी हाय कहाँ से
अंग हो गये ढीले-ढाले

घुटने थके-जोड़ दुखते हैं
फिर भी इनके मन मतवाले

नकली दाँत-आँख भी नकली
चेहरे हुए झुर्रियों वाले

साली अब भी अच्छी लगतीं
नहीं सुहाते इनको साले

अंकल (चाचा) सम्बोधन भाता है
बाबा सुन कर आँख निकाले

चाहे चाँद भले गंजी हो
बाल किए हैं फिर भी काले

"रूप" देखकर राल टपकती
इनको तो अब राम संभाले

18 टिप्‍पणियां:

  1. वाह आदरणीय सर वाह कितना सुन्दर व्यंग कसा है, सत्य एवं सटीक कटाक्ष हार्दिक बधाई स्वीकारें.

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  2. वाह वाह पू्रा सही हाल बयाँ कर दिया :)

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया कटाक्ष ,महोदय
    साभार............


    जवाब देंहटाएं
  4. 'पक्का माल चबाना चाहें,मुहँ में नहीं हैं दांत !
    'चिकनी चुपड़ी अच्छी लागे, पेट में नहीं है आँत !!

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत ही अच्छी मजाहिया पेश कश !!

    जवाब देंहटाएं
  6. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज के ब्लॉग बुलेटिन पर |

    जवाब देंहटाएं
  7. आपने तो बड़ा ही शानदार खाका खींच दिया.

    जवाब देंहटाएं
  8. आज तो व्‍यंग्‍य मार दिया है। बढिया है।

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत खूब आपके एक दम सटीक आकलन करती
    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    तुम मुझ पर ऐतबार करो ।

    जवाब देंहटाएं
  10. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    जवाब देंहटाएं
  11. कुछ लोग कभी नहीं बदलते ....आदतें साथ-साथ चलती है मरते दम तक ,,..
    बढ़िया कटाक्ष ..

    जवाब देंहटाएं

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