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शनिवार, 2 मई 2020

ग़ज़ल "मुखौटे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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रास हमको आ रहे हैं, अब मुखौटे मोम के
कुर्सियों को भा रहे हैं, अब मुखौटे मोम के
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सुबह को कुछ और होते, शाम को कुछ और हैं
देश को तो खा रहे हैं, अब मुखौटे मोम के
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खौफ क्यूँ खायें भला, कानून का बहरूपिये
न्याय करने जा रहे हैं, अब मुखौटे मोम के
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राम से रहमान को लड़वा रहे हैं शान से
चमन को लुटवा रहे हैं, अब मुखौटे मोम के
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ये कभी तो कृष्ण दिखते, कंस दिखते हैं कभी
 ज़ुल्म सब पर ढा रहे हैं, अब मुखौटे मोम के
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आदमी का रूप भर कर, भेड़िए काज़ी बने
माल घर में ला रहे हैं, अब मुखौटे मोम के 
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8 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक चिंतन सुंदर रचना।
    प्रणाम सर।

    जवाब देंहटाएं
  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार(०३-०५-२०२०) को शब्द-सृजन-१९ 'मुखौटा'(चर्चा अंक-३६९०) पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत खूब ... ये मुखौटे मोम के एक दिन खुद की आग में ख़त्म हो जाएँगे ...
    अच्छे शेर हैं सभी ... लाजवाब ...

    जवाब देंहटाएं
  4. सुंदर अभिव्यक्ति ,सादर नमन सर

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह ! बहुत सुन्दर ग़ज़ल शास्त्री जी !'मोम के मुखौटों' पर खूब लक्ष्य साधा है आपने ! साधुवाद !

    जवाब देंहटाएं
  6. वाह बहुत खूब आदरणीय शानदार प्रस्तुति।व्यंग शैली में।

    जवाब देंहटाएं

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