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बुधवार, 20 मई 2020

कविता "सबके अन्तस मैले हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सुबह सवेरे सहमी-सहमी, 
कोयल आयी मेरे घर में। 
कुहू-कुहू गाने वाली के, 
चीत्कार पसरा है सुर में।।
निर्लज-हठी, कुटिल-कौओं ने, 
उसको बहुत सताया था। 
कुदरत का कानून तोड़कर, 
जंगल राज चलाया था।
बँधी हुई आँगन में रस्सी, 
बैठी गयी उसके ऊपर। 
अनजानी आफत को पाकर, 
काँप रही है, वो थर-थर।। 
दूषित है परिवेश आज का, 
लगा खून का चस्का है। 
इस दुनिया में अबलाओं की, 
कोई नहीं सुरक्षा है।।
 
चारों ओर छिपे हैं डाकू, 
लूटमार का आलम है। 
लाचारी की दशा देखकर, 
आँख बहातीं शबनम हैं।। 
इन्सानों के घर में आकर, 
खोज रही ये चैन-अमन। 
अस्मत की खातिर ही इसने, 
छोड़ा अपना बाग-चमन।।
लगता है अब इस धरती में,
सबके अन्तस मैले हैं। 
कंस और रावण के वंशज, 
जगह-जगह पर फैले हैं।।

6 टिप्‍पणियां:


  1. बिल्कुल सही कहा सर आजकल सब बाहर से सफेद और भीतर से स्याह हैं !

    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 21.5.2020 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3708 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।

    धन्यवाद

    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
  3. बेहद हृदयस्पर्शी रचना

    जवाब देंहटाएं

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