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शुक्रवार, 1 मई 2020

दोहे "मजदूर दिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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एक साल में एक दिन, होती जय-जयकार।
मजदूरों का दिवस फिर, कैसे हो साकार।।
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कंप्यूटर जबसे बना, जीवन का आधार।
तबसे श्रमिकों की हुई, बहुत करारी हार।।
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कल-पुरजे खेती करें, श्रमिक हुए लाचार।
नगरों-गाँवों में हुए, मेहनतकश बेकार।।
“मेहनत” की मात्राएँ उच्चारण के अनुसार ही गिनें।
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नैसर्गिक अनुभाव का, गुम हो गये सुझाव।
मजदूरी का इसलिए, होने लगा अभाव।।
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नकली सुमनों में नहीं, होता है मकरन्द।
कृत्रिमता में खोजता, मनुज आज आनन्द।।
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अपने कर्मों से हुए, हम कितने मजबूर।
आज मजे से दूर हैं, कृषक और मजदूर।।
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जबसे दुनिया में बिछा, मशीनरी का जाल।
जीवनयापन हो गया, श्रमिकों का विकराल।।
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7 टिप्‍पणियां:

  1. "अपने कर्मों से हुए, हम कितने मजबूर।
    आज मजे से दूर हैं, कृषक और मजदूर।।"

    सही बात कही सर!

    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. जिनके-जिनके लिए भी ऐसे दिनों का प्रावधान किया गया है, वह कभी भी पनप नहीं पाए हैं ! सिर्फ औपचारिकता भर बन कर रह गए हैं ऐसे दिवस !

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार(०२-०५-२०२०) को "मजदूर दिवस"(चर्चा अंक-३६६८) पर भी होगी
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
    महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    **
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत खूबसूरत रचना,दिन एक है उनके नाम

    जवाब देंहटाएं
  5. सच इंसान का जीवन मशीनरी हुआ तो सारी आपदाएं गरीब के हिस्से आ गईं
    बहुत सही चिंतन प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  6. नकली सुमनों में नहीं, होता है मकरन्द।
    कृत्रिमता में खोजता, मनुज आज आनन्द।।
    वाह!!!
    लाजवाब ....बहुत लाजवाब।

    जवाब देंहटाएं
  7. श्रमिक दिवस पर सार्थक दोहे दर्द और यथार्थ।

    जवाब देंहटाएं

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