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शनिवार, 30 मई 2020

ग़ज़ल "इंसानियत का रूप" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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मदहोश निगाहें हैंखामोश तराना है
मासूम परिन्दों कोअब नीड़ बनाना है
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सूखे हुए शजरों नेपायें हैं नये पत्ते
बुझती हुई शम्मा कोमहफिल में जलाना है
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कुछ करके दिखाने काअरमान हैं दिलों में
उजड़ी हुई दुनिया कोअब फिर से बसाना है
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हिंसा की चल रहीं हैंचारों तरफ हवाएँ
आतंक की आँधी कोअब दूर भगाना है
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फिरकापरस्त होनामज़हब नहीं सिखाता 
बन्धन को काट करके, अब धर्म सिखाना है 
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इस मादरे-वतन कोमक़्तल की जरूरत क्या
अब पाठ अहिंसा कामक़तब में पढ़ाना है
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इंसान आजकल का, हैवान बन गया है
इंसानियत का हमकोअब रूप” दिखाना है
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8 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (३१-०५-२०२०) को शब्द-सृजन-२३ 'मानवता,इंसानीयत' (चर्चा अंक-३७१८) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. समय चलायमान है, परिस्थितियां जरूर बदलेंगी ! यही आशा है

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत खूबसूरत प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  4. कुछ करके दिखाने का, अरमान हैं दिलों में
    उजड़ी हुई दुनिया को, अब फिर से बसाना है

    अनलॉक 1 के लिए आशा संचार करती इस ग़ज़ल हेतु साधुवाद 🌺💐🌹🙏

    जवाब देंहटाएं
  5. फिरकापरस्त होना, मज़हब नहीं सिखाता
    बन्धन को काट करके, अब धर्म सिखाना है ।
    शानदार/उम्दा।

    जवाब देंहटाएं
  6. वाह ! सार्थक सन्देश देती बहुत सुन्दर ग़ज़ल ! बहुत उम्दा !

    जवाब देंहटाएं
  7. इंसान आजकल का, हैवान बन गया है
    इंसानियत का हमको, अब “रूप” दिखाना है
    वाह!!!!
    लाजवाब गजल।

    जवाब देंहटाएं

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