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बुधवार, 13 मई 2020

ग़ज़ल "अनज़ान रास्तों पे निकलना न परिन्दों" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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अनज़ान रास्तों पे, निकलना न परिन्दों 
मंजिल को हँसी-खेल, समझना न परिन्दों 
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आगे कदम बढ़ाना, ज़रा देख-भाल कर 
काँटों से तुम कभी भी उलझना न परिन्दों 
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भोले कबूतरों के लिए, ज़ाल हैं बिछे 
लालच की उस जमीं पे, उतरना न परिन्दों 
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इंसान आजकल के तो, शैतान हो गये 
भरकर चटक-लिबास, सँवरना न परिन्दों  
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अब मीत-मीत का ही, गला काट रहे हैं 
यूँ ही सभी के साथ, विचरना न परिन्दों 
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हिल-मिल के रहना आप, जमाने के साथ में 
सुन लेना सबकी बात, बिगड़ना न परिन्दों 
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भेड़ों के 'रूप' में, छिपे हैं भेड़िये यहाँ 
फूलों को देख करके, मचलना न परिन्दों
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9 टिप्‍पणियां:

  1. इंसान आजकल के तो, शैतान हो गये
    भरकर चटक-लिबास, सँवरना न परिन्दों

    बहुत सही कहा सर!

    बेहतरीन गजल।

    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. सचेत करने वाले भाव. बहुत सुन्दर और सार्थक...

    भेड़ों के 'रूप' में, छिपे हैं भेड़िये यहाँ
    फूलों को देख करके, मचलना न परिन्दों

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 14.5.2020 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3701 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।

    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह! एक एक बंद लाजवाब सार्थक संदेश के साथ.
    सादर प्रणाम

    जवाब देंहटाएं
  5. चेतावनी के स्वर ।
    सहज सुंदर सार्थक।

    जवाब देंहटाएं
  6. आज की आदम्बर्पूर्ण दुनिया में चतुर चौकस रहने की सही सलाह दी है आपने परिंदों को ! बहुत सुन्दर रचना !

    जवाब देंहटाएं
  7. हिल मिलकर रहना साथ,सुन लेना सबकी बात, बहुत सुंदर संदेश

    जवाब देंहटाएं

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