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बुधवार, 6 मई 2020

दोहे "बिकने लगी शराब" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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भारत की सरकार का, कोई नहीं जवाब।
कोरोना के काल में, बिकने लगी शराब।।
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राहत देने के लिए, जहाँ मिली कुछ छूट।
मदिरा पाने के लिए, लोग पड़े हैं टूट।।
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बदले-बदले रंग हैं, बदले-बदले ढंग।
सामाजिक कानून को, लोग कर रहे भंग।।
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सामजिक परिवेश की, हालत हुई विचित्र।
लोग दिखाने लग गये, अपना चित्र-चरित्र।।
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कोरोना से है मचा, जग में हाहाकार।
होगी घर में बैठकर, कोरोना की हार।।
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कोरोना से लड़ रहे, धन्वन्तरि के दूत।
सैनिक-पुलिस जवान हैं, माँ के सच्चे पूत।।
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कोरोना के काल में, घर से होकर दूर।
दर-दर ठोकर खा रहे, बेचारे मजबूर।।
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8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 7.5.2020 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3694 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।

    धन्यवाद

    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर समसामयिक रचना।

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत अच्छी रचना

    सचमुच कोरोना काल में शराब दुकान खोलने का आदेश हास्यास्पद और ख़तरनाक है।

    जवाब देंहटाएं
  4. समाज के लगातार गिरते चरित्र की पहचान आखिरी में कोरोना नें ही करवा दी।
    बहुत ही सुंदर समसामयिक रचना आदरणीय ।
    नमन आपको।

    जवाब देंहटाएं
  5. जरुरत उलटे-सीधे काम करवा ही देती है

    जवाब देंहटाएं

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