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शनिवार, 9 मई 2020

गुलमोहर "बूटा-बूटा लाल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सूरज तन झुलसा रहा, दुनिया है बेहाल।
गुलमोहर का हो गया, बूटा-बूटा लाल।।
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जितनी गरमी पड़ रही, उतना निखरा रूप।
गुलमोहर खिलने लगा, खा कर निखरी धूप।।
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सड़क किनारे है खड़ा, केसरिया को धार।
सब लोगों को बाँटता, मुलमोहर उपहार।।
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गरम हवाएँ पी रहा, खड़ा अनोखा सन्त।
जेठ मास में आ गया, मानो पुनः बसन्त।।
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दुनियाभर को दे रहा, गुलमोहर उपदेश।
खुश हो करके मानिए, कुदरत का आदेश।।
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सुख-दुख दोनों में रहो, हरदम एक समान।
जैसे सुख-दुख झेलता, निर्धन श्रमिक-किसान।।
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कुदरत ने जो कुछ दिया, उस पर है सन्तोष।
है गरमी के साथ में, बारिश का उद्घोष।।
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11 टिप्‍पणियां:

  1. गुलमोहर की सुंदरता का बेहतरीन चित्रण।

    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. इस दौर में कायनात पर और भी निखार आया है

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह्ह अति सुंदर रचना।
    प्रणाम सर।

    जवाब देंहटाएं
  4. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार(१०-०५-२०२०) को शब्द-सृजन- २० 'गुलमोहर' (चर्चा अंक-३६९७) पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह!

    गुलमोहर पर मनमोहक छटा बिखेरता बहुत सुंदर सृजन।

    सादर नमन सर।

    जवाब देंहटाएं
  6. दुनियाभर को दे रहा, गुलमोहर उपदेश।
    खुश हो करके मानिए, कुदरत का आदेश।।

    बेहद सुंदर सृजन सर सादर नमन आपको

    जवाब देंहटाएं
  7. सुख-दुख दोनों में रहो, हरदम एक समान।
    जैसे सुख-दुख झेलता, निर्धन श्रमिक-किसान।।
    बहुत सुन्दर और सार्थक सृजन .

    जवाब देंहटाएं
  8. वाह!!!
    अत्यंत सुन्दर ...गुलमोहर सी मनभावन कृति।

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत बहुत सुंदर!!
    सुख-दुख दोनों में रहो, हरदम एक समान।
    जैसे सुख-दुख झेलता, निर्धन श्रमिक-किसान।।
    सटीक सार्थक।

    जवाब देंहटाएं

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