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शनिवार, 15 अगस्त 2020

कविता "रजत कणों की तारा सी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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2010 में प्रकाशित  
"सुख का सूरज" 
मेरी प्रथम काव्य कृति से एक रचना!
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माता की कृपा बरसती जब,
तब शब्द निकलकर आते हैं।
हो लगन अगर सच्ची मन में,
तब गीत-ग़ज़ल बन जाते हैं।।
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तुम शब्दयुक्त हो छन्दमुक्त,
बहती हो निर्मल धारा सी।
तुम सरल-तरल अनुप्रासयुक्त,
हो रजत कणों की तारा सी।।
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आलेख पंक्तियाँ जोड़-तोड़कर
बन जाते है कुछ गद्यगीत।
संयोग-वियोग, भक्ति रस से,
छलकाती माँ तुम प्रीत-रीत।।
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उपवन में गन्ध तुम्हारी है,
कानन में है मृदुगान भरा।
लगती रजनी उजियारी सी,
सुख के सूरज से सजी धरा।।
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मेरे कोमल मन के नभ पर,
बदली बनकर छा जाती हो।
इतनी हो सुघड़-सलोनी सी,
सपनों में निशि-दिन आती हो।।
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तुम छन्द-काव्य से ओत-प्रोत,
कोमल भावों की रचना हो।
जिसमें अनुराग निहित मेरा,
वो सुरसवती सी रसना हो।।
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7 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

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  2. सारगर्भित--श्रीरामरॉय

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  3. सत्य ही रहता नहीं ये ध्यान तुम कविता कुसुम या कामिनी हो या फिर छंदबद्ध गीत या अकविता
    बेहतरीन रचना शास्त्री जी की।
    veeruji05.blogspot.com
    veerujan.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत बढ़िया रचना, आदरणीय शास्त्री जी।

    जवाब देंहटाएं
  5. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार (17अगस्त 2020) को 'खामोशी की जुबान गंभीर होती है' (चर्चा अंक-3796) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    -रवीन्द्र सिंह यादव

    जवाब देंहटाएं
  6. सुन्दर भावनाओं से परिपूर्ण गीत । हार्दिक आभार ।

    जवाब देंहटाएं

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