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शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

दोहे "दुनिया में इंसान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जब हर घर में जन्मते, दुनिया में इंसान।
मानवता का क्यों हुआ, फिर जग में अवसान।।
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देख दशा संसार की, हुए हौसले पस्त।
भरी दुपहरी में हुआ, मानो सूरज अस्त।।
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मान और अपमान का, नहीं किसी को ध्यान।
सरे आम इंसान का, बिकता है ईमान।।
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भरे पड़े इस जगत में, बड़े-बड़े धनवान।
श्री के बिन कैसे कहें, उनको हम श्रीमान।।
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जीने का जब सीखना, चाहा हमने ढंग।
बढ़ीं व्यस्तताएँ तभी, समय हो गया तंग।।
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आपस में लड़ते नहीं, राम और रहमान।
फिर मानव क्यों उलझता, बन करके नादान।।
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दुनिया में बिखरे हुए, भाँति-भाँति के रंग।
मत-मजहब के फेर में, मानवता है भंग।।
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सबके पूजा-पाठ के, अलग-अलग हैं ढंग।
पन्थ भले ही भिन्न हों, भारत के सब अंग।।
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5 टिप्‍पणियां:

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