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गुरुवार, 20 अगस्त 2020

ग़ज़ल "आपदा आफत मचाने आ गयी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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आज फिर बारिश डराने आ गयी
चैन लोगों का चुराने आ गयी
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बादलों से फलक मैला हो गया
पर्वतों पर कहर ढाने आ गयी
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आसमाँ में चमकती यह रौशनी
जलजलों का गीत गाने आ गयी
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लीलने को अब नहीं कुछ भी बचा
आपदा आफत मचाने आ गयी
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जिन्दगी के आशियाने ढह गये
मुफलिसों को भी सताने आ गयी
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जब जरूरत थी नदारद हो गयी
बस्तियों को अब डुबाने आ गयी
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बाँटता दुख अब तुम्हारा रूप है
क्यों हमें सूरत दिखाने आ गयी
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5 टिप्‍पणियां:

  1. कैसी विडंबना है कि जो बरखा जीवनदायनी मानी जाती थी वही आज प्राण-हरिणी हो गई है

    जवाब देंहटाएं
  2. अतिवृष्टि के दुष्प्रभावों का मर्मस्पर्शी अंकन ।

    जवाब देंहटाएं
  3. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 21-08-2020) को "आज फिर बारिश डराने आ गयी" (चर्चा अंक-3800) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है.

    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
  4. जिन्दगी के आशियाने ढह गये
    मुफलिसों को भी सताने आ गयी
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    जब जरूरत थी नदारद हो गयी
    बस्तियों को अब डुबाने आ गयी

    प्रकृति का यह रूप वाकई भयावह है लेकिन फिर सोचता हूँ कि यह सब हमारा ही तो किया धरा है.... सुन्दर रचना.....

    जवाब देंहटाएं
  5. प्राकृतिक आपदा पर बहुत ही सुंदर रचना आदरणीय शास्त्री जी

    जवाब देंहटाएं

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