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गुरुवार, 27 अगस्त 2020

गीत "आशा के दीप जलाओ तो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जलने को परवाना आतुरआशा के दीप जलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातकगगरी से जल छलकाओ तो।।
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मधुवन में महक समाई हैकलियों में यौवन सा छाया,
मस्ती में दीवाना होकरभँवरा उपवन में मँडराया,
मन झूम रहा होकर व्याकुलतुम पंखुरिया फैलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातकगगरी से जल छलकाओ तो।।
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मधुमक्खी भीने-भीने स्वर मेंसुन्दर राग सुनाती है,
सुन्दर पंखों वाली तितली भीआस लगाए आती है,
सूरज की किरणें कहती हैकलियों खुलकर मुस्काओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातकगगरी से जल छलकाओ तो।।
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चाहे मत दो मधु का कणभरपर आमन्त्रण तो दे दो,
पहचानापन विस्मृत करकेइक मौन-निमन्त्रण तो दे दो,
काली घनघोर घटाओं मेंबिजली बन कर आ जाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातकगगरी से जल छलकाओ तो।।
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7 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 28-08-2020) को "बाँच ली मैंने व्यथा की बिन लिखी पाती नयन में !"
    (चर्चा अंक-3807)
    पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है.

    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
  2. 'पहचानापन विस्मृत करके, इक मौन-निमन्त्रण तो दे दो'... वाह डॉ. मयङ्क! इस सुन्दर, मनमोहक रचना के लिए हार्दिक बधाई!

    जवाब देंहटाएं
  3. बेहद खूबसूरत रचना आदरणीय

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही सुंदर रचना आदरणीय शास्त्री जी

    जवाब देंहटाएं
  5. मधुमक्खी भीने-भीने स्वर में, सुन्दर राग सुनाती है,
    सुन्दर पंखों वाली तितली भी, आस लगाए आती है.. बहुत सुंदर, तुकबंदी के साथ कव‍िताऐं आज भी अपना अलग स्थान रखती हैं... आपकी कव‍ितायें मार्गदर्शक हैं नए कव‍ियों के ल‍िए

    जवाब देंहटाएं

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