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सोमवार, 24 अगस्त 2020

दोहे "उगने लगे बबूल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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बरगद बौने हो गये, उगने लगे बबूल।
पीपल जामुन-आम को, लोग रहे हैं भूल।।
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थोड़े से ही रह गये, धरती पर तालाब।
बगिया में घटने लगे, गुड़हल और गुलाब।
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धरती बंजर सी हुई, चिन्ता की है बात।
कैमीकल की खाद से, विकट हुए हालात।।
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लालच के परिवेश में, लीची हुई उदास।
नहीं रही अमरूद में, अब कुदरती मिठास।।
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पाश्चात्य धुन में हुए, तबला-ढोलक गोल।
कोकिल के भी हो गये, कागा जैसे बोल।।
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कोरोना की हो रही, दुनिया में भरमार।
चीन जनित इस रोग का, नहीं कहीं उपचार।।
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अर्पण-तर्पण बन गया, मात्र दिखावा आज।
बेमन से होने लगा, पूजा-वन्दन काज।।
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5 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (25 -8 -2020 ) को "उगने लगे बबूल" (चर्चा अंक-3804) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
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    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  2. आदरणीय आपके दोहों के सटीक सृजन से हमलोगों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है। आनंद आ गया!--ब्रजेन्द्रनाथ

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह!बहुत खूबसूरत सृजन आदरणीय । सुंदर सीख देते हुए दोहे ।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर और सटीक दोहे आदरणीय

    जवाब देंहटाएं
  5. सुंदर. विचार भी बोनसाई की तरह होते जा रहे हैं.

    जवाब देंहटाएं

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