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बुधवार, 8 दिसंबर 2021

दोहे "सुख देती है धूप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सुरनरमुनि के ज्ञान कीजब ढल जाती धूप।
छत्र-सिंहासन के बिनारंक कहाते भूप।।
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बिना धूप के खेत मेंफसल नहीं उग पाय।
बारिश-गरमी-शीत कोभुवनभास्कर लाय।।
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शैल शिखर उत्तुंग परजब पड़ती है धूप।
हिमजल ले सरिता बहेंले गंगा का रूप।।
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नष्ट करे दुर्गन्ध कोशीलन देय हटाय।
पूर्व दिशा के द्वार पररोग कभी ना आय।।
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खग-मृगकोयल-काग कोसुख देती है धूप।
उपवन और बसन्त कायह सवाँरती रूप।।
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गेहूँ उगता ग़ज़ल सासरसों करे किलोल।
बन्द गले के सूट मेंढकी ढोल की पोल।।
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मौसम आकर्षित करेहमको अपनी ओर।
कनकइया डग-मग करेहोकर भावविभोर।।
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कड़क नहीं माँझा रहानाज़ुक सी है डोर।
पतंग उड़ाने को चलाबिन बाँधे ही छोर।।
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पत्रक जब पीला हुआहरियाली नहीं पाय।
जाने कब शाखाओं सेपके पान झड़ जाय।।
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5 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(०९-१२ -२०२१) को
    'सादर श्रद्धांजलि!'(चर्चा अंक-४२७३)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह!!!
    बहुत ही लाजवाब एवं अद्भुत दोहे।

    जवाब देंहटाएं
  3. खग-मृग, कोयल-काग को, सुख देती है धूप।
    उपवन और बसन्त का, यह सवाँरती रूप।।

    बहुत ही सुन्दर दोहे, सादर नमस्कार सर

    जवाब देंहटाएं

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