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शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

"नजर न आया वेद कहीं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


देश-वेश और जाति, धर्म का, मन में कुछ भी भेद नहीं।
भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।

सरदी की ठण्डक में ठिठुरा, गर्मी की लू झेली हैं,
बरसातों की रिम-झिम से जी भर कर होली खेली है,
चप्पू दोनों सही-सलामत, पर नौका में  छेद कहीं।
भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।

सुख में कभी नही मुस्काया, दुख में कभी नही रोया,
जीवन की नाजुक घड़ियों में, धीरज कभी नही खोया,
दुनिया भर की पोथी पढ़ लीं, नजर न आया वेद कहीं।
भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।

आशा और निराशा का संगम हैएक परिभाषा है,
कभी गरल है, कभी सरल है, जीवन एक पिपासा है,
गलियों मे बह रहा लहू है, दिखा कहीं श्रम-स्वेद नहीं।
भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।

15 टिप्‍पणियां:

  1. यथार्थ को स्पष्ट करती सुदर रचना!

    गलियों मे बह रहा लहू है, दिखा कहीं श्रम-स्वेद नहीं।भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।

    .....आभार!

    जवाब देंहटाएं
  2. दार्शनिकता के भावों से परिपूर्ण रचना ....बहुत सुन्दर कुछ अलग

    जवाब देंहटाएं
  3. भावों में दार्शनिकता और संतुष्टि परिलक्षित करती कविता.

    जवाब देंहटाएं
  4. आशा और निराशा का संगम है, एक परिभाषा है,
    कभी गरल है, कभी सरल है, जीवन एक पिपासा है,
    गलियों मे बह रहा लहू है, दिखा कहीं श्रम-स्वेद नहीं।
    भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।

    .....जीवन की सच्चाई का गहन और सुंदर प्रवाहमयी चित्रण...आभार

    जवाब देंहटाएं
  5. छेद नाव में होने से भी, कभी नहीं नाविक घबराया ।

    जल-जीवन में गहरे गोते, सदा सफलता सहित लगाया ।

    इतना लम्बा अनुभव अपना, नाव किनारे पर आएगी -

    इन हाथों पर बड़ा भरोसा, बाधाओं को पार कराया ।

    अगर स्वार्थ के काले चेहरे, थाली में यूँ छेद करेंगे -

    भौंक भौंक के भूखे मरना, किस्मत में उसने लिखवाया ।।

    नाव दुबारा फिर उतरेगी, पार करेगी सागर खारा ।

    रखियेगा पतवार थाम के , डाक्टर फिक्स-इट छेद भराया ।।

    जवाब देंहटाएं
  6. जीवन अनुभव छिटकाती पंक्तियाँ..

    जवाब देंहटाएं
  7. शाष्त्री जी सच यही है जीवन तो जी लिया अब तो रिहर्सल है .कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं .बहुत दिया देने वाले ने तुझको ,आँचल ही न समाये तो क्या, कीजे ,बीत गए जैसे ये दिन रैना ,बाकी भी कट जाए ,देश-वेश और जाति, धर्म का, मन में कुछ भी भेद नहीं।भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।दुआ कीजे .वीरुभाई सी ४ ,अनुराधा ,कोलाबा , नेवल ऑफिसर्स फेमिली रेज़िदेंशियल एरिया (नोफ्रा ) नेवी नगर, मुंबई-४००-००५

    कृपया यहाँ भी पधारें -
    रक्त तांत्रिक गांधिक आकर्षण है यह ,मामूली नशा नहीं

    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/
    आरोग्य की खिड़की

    आरोग्य की खिड़की

    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/04/blog-post_992.html

    जवाब देंहटाएं
  8. भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।

    आपने सही फरमाया,सुंदर रचना,.....

    जवाब देंहटाएं
  9. आशा और निराशा का संगम है, एक परिभाषा है,
    कभी गरल है, कभी सरल है, जीवन एक पिपासा है!
    जीवन का सार यही है !

    जवाब देंहटाएं
  10. गलियों मे बह रहा लहू है, दिखा कहीं श्रम-स्वेद नहीं।………बेहद उम्दा और सारगर्भित रचना

    जवाब देंहटाएं
  11. veerubhai ने कहा…

    नाव दुबारा फिर उतरेगी, पार करेगी सागर खारा ।जीवन पथ पे चलते चलते, कभी पथिक न हारा .

    कृपया यहाँ भी पधारें रक्त तांत्रिक गांधिक आकर्षण है यह ,मामूली नशा नहीं
    शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/04/blog-post_2612.html
    मार -कुटौवल से होती है बच्चों के खानदानी अणुओं में भी टूट फूट
    Posted 26th April by veerubhai
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/04/blog-post_27.html

    जवाब देंहटाएं
  12. आशा और निराशा का संगम है, एक परिभाषा है,
    कभी गरल है, कभी सरल है, जीवन एक पिपासा है!
    behtareeen.....

    जवाब देंहटाएं

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