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गुरुवार, 14 जून 2012

"मौसम के सारे फल खाना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


गर्मी का मौसम है आया।
आड़ू और खुमानी लाया।।

आलूचा है या कहो बुखारा।
काला-काला कितना प्यारा।।

खट्टे-मीठे और रसीले।
काले-लाल और हैं पीले।।

सूरज जब शोले बरसाता।
धरती का पारा बढ़ जाता।।

ये पर्वत से चलकर आते।
मैदानों की प्यास बुझाते।।
 
अगर चाहते हो सुख पाना।
मौसम के सारे फल खाना।।

14 टिप्‍पणियां:

  1. vaah ..kavita padh kar munh me paani aa gaya hai... jaati hun Freeze tatolne... sundar kavita

    जवाब देंहटाएं
  2. स्वास्थ्य संस्कार |
    फलों की बहार |
    लू का प्रहार -
    हारेगा बार बार |
    खाइए मौसमी फल-
    मजेदार रसदार ||
    बढ़िया सन्देश-
    गुरुवर आभार ||

    जवाब देंहटाएं
  3. क्या बात है शास्त्री जी फलों की महिमा काव्यात्मक अंदाज़ में .

    जवाब देंहटाएं
  4. aadarniy sir
    bahut hi sahi ye jo prakriti ne hame saare mousam ke anurup phal diye hain yani har mousam me alag -alag v svadishta se bhar pur hame jarur hi khane chahiye.
    bahut hi badhiya prastuti
    hardik naman
    poonam

    जवाब देंहटाएं
  5. फिर से चर्चा मंच पर, रविकर का उत्साह |

    साजे सुन्दर लिंक सब, बैठ ताकता राह ||

    --

    शुक्रवारीय चर्चा मंच

    जवाब देंहटाएं
  6. फलों का मीठापन यूँ ही बना रहे..

    जवाब देंहटाएं
  7. अगर चाहते हो सुख पाना।
    मौसम के सारे फल खाना।।

    ज़रूर खायेंगे,शास्त्री जी.
    अच्छी रचना.

    जवाब देंहटाएं
  8. श्रीमान जी आपके ब्‍लाग को ज्‍वाईन कर लिया है सुन्‍दर प्रस्‍तुति है

    यूनिक तकनीकी ब्‍लाग

    जवाब देंहटाएं
  9. वाह ... बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

    जवाब देंहटाएं

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