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मंगलवार, 19 जून 2012

"बादल घने हैं....." (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कभी कुहरा, कभी सूरज, कभी आकाश में बादल घने हैं।
दुःख और सुख भोगने को, जीव के तन-मन बने हैं।।

आसमां पर चल रहे हैं, पाँव के नीचे धरा है,
कल्पना में पल रहे हैं, सामने भोजन धरा है,
पा लिया सब कुछ मगर, फिर भी बने हम अनमने हैं।
दुःख और सुख भोगने को, जीव के तन-मन बने हैं।।

आयेंगे तो जायेंगे भी, जो कमाया खायेंगें भी,
हाट मे सब कुछ सजा है, लायेंगे तो पायेंगे भी,
धार निर्मल सामने है, किन्तु हम मल में सने हैं।
दुःख और सुख भोगने को, जीव के तन-मन बने हैं।।

देख कर करतूत अपनी, चाँद-सूरज हँस रहे हैं,
आदमी को बस्तियों में, लोभ-लालच डस रहे हैं,
काल की गोदी में, बैठे ही हुए सारे चने हैं।
दुःख और सुख भोगने को, जीव के तन-मन बने हैं।।

16 टिप्‍पणियां:

  1. पा लिया सब कुछ मगर, फिर भी बने हम अनमने हैं।दुःख और सुख भोगने को, जीव के तन-मन बने हैं।
    ...यही तो मनुष्य स्वभाव है!...सुन्दर भावोक्ति!

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर और गहन भाव लिए हुये ... सुंदर प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर भाव संयोजन

    जवाब देंहटाएं
  4. फिर से चर्चा मंच पर, रविकर का उत्साह |

    साजे सुन्दर लिंक सब, बैठ ताकता राह ||

    --

    बुधवारीय चर्चा मंच

    जवाब देंहटाएं
  5. आसमां पर चल रहे हैं, पाँव के नीचे धरा है,
    कल्पना में पल रहे हैं, सामने भोजन धरा है,
    पा लिया सब कुछ मगर, फिर भी बने हम अनमने हैं।
    दुःख और सुख भोगने को, जीव के तन-मन बने हैं।।

    बहुत सुंदर .... सच्चाई कहती अच्छी रचना

    जवाब देंहटाएं
  6. जीवन दर्शन को दर्शाती सुन्दर शब्दों में भावपूर्ण रचना.

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत ही सुन्दर कविता, अच्छी सीख देती कविता..

    जवाब देंहटाएं
  8. काश ये बादल जल्दी जल्दी बरसे ....

    जवाब देंहटाएं
  9. भावपूर्ण वाक्यों की अभिव्यक्ति|

    जवाब देंहटाएं

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