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गुरुवार, 3 अक्तूबर 2019

"अक्टूबर 2019 में मेरा गीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गौरय्या का नीड़, चील-कौओं ने हथियाया है
हलो-हाय का पाठ हमारे बच्चों को सिखलाया है
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जाल बिछाया अपना, छीनी है हिन्दी की बिन्दी भी
अपने घर में हुई परायी, अपनी भाषा हिन्दी भी
खोटे सिक्के से लोगों के मन को बहलाया है
हलो-हाय का पाठ हमारे बच्चों को सिखलाया है
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हिन्दीभाषा से हमने, भारत स्वाधीन कराया था
हिन्दी में भाषण करके, सत्ता का आसन पाया था
लेकिन गद्दी पाते ही उस हिन्दी को बिसराया है
हलो-हाय का पाठ हमारे बच्चों को सिखलाया है
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चीन और जापान आज भाषा के बल पर आगे हैं
किन्तु हमारे खेवनहारे नहीं नींद से जागे हैं
अन्न देश का खाकर, राग विदेशी हमने गाया है
हलो-हाय का पाठ हमारे बच्चों को सिखलाया है
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विश्वपटल पर कैसे होगी, अब पहचान हमारी
वाणी क्यों हो गयी विदेशी, क्या है ऐसी लाचारी
पुरखों के गौरव-गुमान पर भी संकट गहराया है
हलो-हाय का पाठ हमारे बच्चों को सिखलाया है
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अन्धे-गूँगे-बहरों को क्या अपनी व्यथा सुनायें अब
हुक्मरान हिन्दी के दिन को हिन्दी-डे बतलाएँ अब
हलवा-पूड़ी व्यञ्जन छोड़े, पिज्जा-बर्गर खाया है
हलो-हाय का पाठ हमारे बच्चों को सिखलाया है
--

3 टिप्‍पणियां:



  1. जी नमस्ते,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (0५ -१०-२०१९ ) को "क़ुदरत की कहानी "(चर्चा अंक- ३४७४) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही सार्थक सृजन आदरणीय ।

    जवाब देंहटाएं

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