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सोमवार, 7 अक्तूबर 2019

दोहे "आभासी संसार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
बिना किसी हथियार केकरते हैं सब वार।
देखो कितना मुक्त हैआभासी संसार।।
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बिना किसी आकार केलगता जो साकार।
सपनों में सबके बसेआभासी संसार।।
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बिना किसी सम्बन्ध केभावों का संचार।
अनुभव करते हृदय सेआभासी संसार।।
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होता अन्तर्जाल परदूर-दूर से प्यार।
अच्छा लगता है बहुतआभासी संसार।।
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बिन माँगे मिलते जहाँबार-बार उपहार।
अपनापन है बाँटताआभासी संसार।।
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साझा करते हैं जहाँअपने सभी विचार।
टिप्पणियाँ स्वीकारताआभासी संसार।।
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लिए अधूरे ज्ञान कोभरते सब हुंकार।
भरा हुआ है दम्भ सेआभासी संसार।।
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कवियों के तो नाम कीलम्बी लगी कतार।
छन्दों को है लीलताआभासी संसार।।
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माली हों जब लूटतेअपनी स्वयं बहार।
आपाधापी का हुआआभासी संसार।।
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सत्य बताने के लिए“रूप” हुआ लाचार।
नौसिखियों के सामनेसर्जक हैं बेकार।।
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1 टिप्पणी:

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