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शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2019

गीत "पथ नहीं सरल यहाँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सवाल पर सवाल हैंकुछ नहीं जवाब है।
राख में दबी हुईहमारे दिल की आग है।।
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गीत भी डरे हुएताल-लय उदास हैं.
पात भी झरे हुएशेष चन्द श्वास हैं,
दो नयन में पल रहानग़मग़ी सा ख्वाब है।
राख में दबी हुईहमारे दिल की आग है।।
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ज़िन्दगी तो है सफरपथ नहीं सरल यहाँ,
मंजिलों को खोजतापथिक यहाँ-कभी वहाँ,
रंग भिन्न-भिन्न हैंकिन्तु नहीं फाग है।
राख में दबी हुईहमारे दिल की आग है।।
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बाट जोहती रहींडोलियाँ सजी हुई,
हाथ की हथेलियों मेंमेंहदी रची हुई,
हैं सिंगार साथ मेंपर नहीं सुहाग है।
राख में दबी हुईहमारे दिल की आग है।।
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इस अँधेरी रात मेंजुगनुओं की भीड़ है,
अजनबी तलाशतासिर्फ एक नीड़ है,
रौशनी के वास्तेजल रहा च़िराग है। 
राख में दबी हुईहमारे दिल की आग है।।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  2. जी नमस्ते,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (१८-१०-२०१९ ) को " व्याकुल पथिक की आत्मकथा " (चर्चा अंक- ३४९३ ) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं

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