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रविवार, 13 अक्तूबर 2019

दोहे "पावस का त्यौहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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शशि की किरणों में भरी, सबसे अधिक उजास।
शरदपूर्णिमा धरा पर, लाती है उल्लास।१।
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लक्ष्मीमाता धरा पर , आने को तैयार।
शरदपूर्णिमा पर्व पर, लेती हैं अवतार।२।
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त्यौहारों का आगमन, करे कार्तिक मास।
सरदी का होने लगा, अब कुछ-कुछ आभास।३।
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दीपमालिका आ रही, लेकर अब उपहार।
देता शुभसन्देश है, पावस का त्यौहार।४।
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दमक उठे हैं रात में, कोठी-महल-कुटीर।
नदियों में बहने लगा, निर्मल पावन नीर।५।
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अमृत वर्षा कर रही, शरदपूर्णिमा रात।
आज अनोखी दे रहा, शरदचन्द्र सौगात।६।
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खिला हुआ है गगन में, उज्जवल-धवल मयंक।
नवल-युगल मिलते गले, होकर आज निशंक।७।
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निर्मल हो बहने लगा, सरिताओं में नीर।
मन्द-मन्द चलने लगा, शीतल-सुखद समीर।८।
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शरदपूर्णिमा दे रही, सबको यह सन्देश।
तन-मन, आँगन-गेह का, करो स्वच्छ परिवेश।९।
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फसल धान की आ गयी, खुशियाँ लेकर साथ।
भरा रहेगा धान्य से, मजदूरों का हाथ।१०।
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4 टिप्‍पणियां:

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