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रविवार, 27 अक्तूबर 2019

गीत "मिट्टी के ही दीपक सदा जलाओ तुम" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



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निर्धन के सपनों को,
उत्सव में साकार बनाओ तुम।
अपने घर में मिट्टी के ही,
दीपक सदा जलाओ तुम।।
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चीनी लड़ियाँ नहीं लगाना, अबकी बार दिवाली में,
योगदान सबको करना है, अपनी अर्थप्रणाली में,
अपने जन-गण की ताकत,
दुनिया को आज दिखाओ तुम।
अपने घर में मिट्टी के ही,
दीपक सदा जलाओ तुम।।
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महापर्व पर रहे न कोई, नर-नारी कंगाली में,
खुश होकर खुशियों को बाँटो, रहो न खामखयाली में,
कानों को जो सबको भाये,
वैसा साज बजाओ तुम।
अपने घर में मिट्टी के ही,
दीपक सदा जलाओ तुम।।
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चहल-पहल होती पर्वों पर, हाट और बाजारों में,
सावधान रहना है सबको, चूक न हो रखवाली में,
काँटे-कंकड़ रहे न पथ में,
ऐसी राह बनाओ तुम।
अपने घर में मिट्टी के ही,
दीपक सदा जलाओ तुम।।
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भरी हुई है वैज्ञानिकता, भारत के त्यौहारों में,
प्रीत-रीत से दिये जलाओ, घर-आँगन दीवारों में,
ईद-दिवाली-होली मिलकर,
सबके साथ मनाओ तुम।
अपने घर में मिट्टी के ही,
दीपक सदा जलाओ तुम।।
--
ब्रह्मा बन कच्ची माटी को, देते जो आकारों में,
खुशियाँ लाती है दीवाली, कारीगर कुम्भारों में,
उनकी रचनाकारी का भी,
कुछ तो दाम लगाओ तुम।
अपने घर में मिट्टी के ही,
दीपक सदा जलाओ तुम।।
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1 टिप्पणी:

  1. जी नमस्ते,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (२८ -१०-२०१९ ) को " सृष्टि में अँधकार का अस्तित्त्व क्यों है?" ( चर्चा अंक - ३५०२) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं

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