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सोमवार, 16 दिसंबर 2019

दोहे "सम्बन्धों की धार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सम्बन्धों को जी नहीं, पाते हैं जो लोग।
अपनेपन का वो यहाँ, झेलें सदा वियोग।।
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सम्बन्धों की नाव की, नाजुक है पतवार।
इसे प्यार से थामकर, करना सागर पार।।
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सम्बन्धों की डोर को, अधिक न देना ढील।
मत देना परिवार में, झूठी कभी दलील।।
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कर्म असीमित है यहाँ, सीमित हैं अधिकार।
बहने देना प्यार से, सम्बन्धों की धार।।
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मतलब पड़ने पर जहाँ, होते हैं अनुबन्ध।
अधिक देर टिकते नहीं, वहाँ कभी सम्बन्ध।।
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सम्बन्धों के नाम पर, मत करना अनुबन्ध।
केवल दुआ-सलाम तक, रहने दो सम्बन्ध।।
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गायब होते जा रहे, अब असली सम्बन्ध।
मतलब के संसार में, आती है दुर्गन्ध।।
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जहाँ दूर तक भी नहीं, उगते हैं सम्बन्ध।
सम्बन्धों पर हैं वहाँ, झूठे शोध-प्रबन्ध।।
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