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गुरुवार, 19 दिसंबर 2019

ग़ज़ल " कैसे जान बचाऊँ मैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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कैसे लिखूँ ग़ज़ल का मतला, मक्ता कैसे पाऊँ मैं
वनवासी दुनिया में कैसे, अपने शेर सजाऊँ मैं
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 नहीं रहे अब झाड़ी जंगल, भटक रहा हूँ राहों में
पात-पात में छुपे शिकारी, कैसे जान बचाऊँ मैं
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आफताब़-माहताब़ उन्हीं के, जिनके केवल नाम बड़े
लिख करके अनमोल फसाने, बोलो कहाँ लगाऊँ मैं
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सोनचिरय्या के सब गहने, छीन लिए गौरय्यों ने,
खर-पतवार भरे खेतों में, कैसे पौध उगाऊँ मैं
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पूजा होती 'रूप'-रंग की, ज्ञानी याचक-चाकर हैं,
लुप्त हुए चाणक्य, कहाँ से सुथरा-शासन लाऊँ मैं
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5 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार(20 -12 -2019) को "कैसे जान बचाऊँ मैं"(चर्चा अंक-3555)  पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

    आप भी सादर आमंत्रित है 

    ….
    अनीता लागुरी 'अनु '

    जवाब देंहटाएं
  2. मैंने अभी आपका ब्लॉग पढ़ा है, यह बहुत ही शानदार है।
    Viral-Status.com

    जवाब देंहटाएं
  3. नहीं रहे अब झाड़ी जंगल, भटक रहा हूँ राहों में
    पात-पात में छुपे शिकारी, कैसे जान बचाऊँ मैं
    --
    हमेशा की तरह बेमिसाल।
    आदरणीय।

    जवाब देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  5. मुझे यह आर्टिकल पड कर बहुत अच्छा लगा कि हमारे देश भी technlogy के मामले आगे बड रहा है। मैंने भी अपना ब्लॉग बनाया है चाहे तो आप एक बार अवश्य visit का ।
    Shayaribell

    जवाब देंहटाएं

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