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बुधवार, 18 दिसंबर 2019

दोहे "लोकतन्त्र है मौन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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निकला है तूणीर से, एक नया फिर तीर।
बिन तैयारी के हुआ, रोड-टैग तामीर।।
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बिना विचारे थोपती, नियम यहाँ सरकार।
टोल-ठिकानों पर लगी, भारी आज कतार।।
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ठगे हुए से देखते, लोग नये कानून।
शासन के लिखता जा रहा, मनमाने मजमून।।
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भेड़ हो गयी है प्रजा, भय से है लाचार।
देख सामने भेड़िया, भय से रही निहार।।
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पसरा अब तो देश में, चहुँदिश हाहाकार।
 आज सुनाई दे रहा, केवल चीख-पुकार।।
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कोई खुश है हो रहा, कोई है हलकान।
सियासती परिवेश की, खुली हुई दूकान।।
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मत-मजहब के नाम पर, दंगों का है जोर।
बिन मतलब की बात पर, लोग कर रहे शोर।।
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आज अनैतिक कृत्य पर, लोकतन्त्र है मौन।
मोदी जी के नाम पर, डरा रहा है कौन।।
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