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गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

दोहे "मानवता लाचार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



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अब फैशन इस दौड़ में, मानवता लाचार।।
नहीं रही शालीनता, वस्त्र गये हैं हार।।
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उपवन में कलियाँ करें, जब-जब भी शृंगार।
उन्हें रिझाने के लिए, मधुप करें गुंजार।।
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कामुकता के मूल में, सुन्दरता के तार।
रूप-गन्ध के लोभ में, मधुप करें बेगार।।
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रूप-रंग को देखकर, मधुप हुआ लाचार।
असली सुमनों से करें, भँवरे नकली प्यार।।
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बदल गया है आज तो, यौवन का किरदार।
आवारा षटपद करें, जबरन यौनाचार।।
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बैरी पॉलीथीन की, घर-घर में भरमार।
गन्दे नालों सी हुई, सरिताओं की धार।।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (27-12-2019) को "शब्दों का मोल" (चर्चा अंक-3562)  पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

    आप भी सादर आमंत्रित है 
    ….
    -अनीता लागुरी 'अनु '

    जवाब देंहटाएं
  2. एकदम सही कहा है आपने...
    बहुत खूब!!!

    जवाब देंहटाएं

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