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सोमवार, 9 दिसंबर 2019

गीत "मख़मली परिवेश को क्या हो गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आज मेरे देश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है
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पुष्प-कलिकाओं पे भँवरे, रात-दिन मँडरा रहे,
बागवाँ बनकर लुटेरे, वाटिका को खा रहे,
सत्य के उपदेश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है?
 --
धर्म-मज़हब का हमारे देश में सम्मान है,
जियो-जीने दो, यही तो कुदरती फरमान है,
आज इस आदेश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है?
 --
खोजते दैर-ओ-हरम में राम और रहमान को,
एकदेशी समझते हैं, लोग अब भगवान को,
धार्मिक सन्देश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है?
 --

1 टिप्पणी:

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