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रविवार, 22 दिसंबर 2019

दोहे "थम जाये घुसपैंठ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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प्रजातन्त्र का सिरफिरे, भूल गये हैं अर्थ।
सर्व धर्म समभाव से, बनता देश समर्थ।।
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एक पन्थ में क्यों भरा, इतना आज जुनून।
बना सभी के है लिए, भारत का कानून।।
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अल्ला के इसलाम को, लोग गये हैं भूल।
मुल्लाओं की बात को, करते लोग कुबूल।।
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भारत के जो नागरिक, भूल गये है फर्ज।
कर दो उनके नाम पर, राजद्रोह अब दर्ज।।
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पत्थरबादी कर रहे, पढ़कर लोग नमाज।
मुक्त कीजिए जल्द ही, इनसे देश-समाज।।
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पागलपन में धर्म की, लोग रहे हैं ऐंठ।
मकसद है सरकार का, थम जाये घुसपैंठ।।
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दोनों सदनों में हुआ, पारित जब कानून।
बदला जायेगा नहीं, अब कोई मजमून।।
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1 टिप्पणी:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (23-12-2019) को "थोड़ी सी है जिन्दगी" (चर्चा अंक 3558 ) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं…
    *****
    रवीन्द्र सिंह यादव




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