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नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!
जनसेवक खाते हैं काजू,
महँगाई खाते बेचारे!!
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काँपे माता-काँपे बिटिया, भरपेट न जिनको भोजन है,
क्या सरोकार उनको इससे, क्या नूतन और पुरातन है,
सर्दी में फटे वसन फटे सारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!
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जो इठलाते हैं दौलत पर, वो खूब मनाते नया-साल,
जो करते श्रम का शीलभंग, वो खूब कमाते द्रव्य-माल,
भाषण में हैं कोरे नारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!
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नव-वर्ष हमेशा आता है, सुख के निर्झर अब तक न बहे,
सम्पदा न लेती अंगड़ाई, कितने दारुण दुख-दर्द सहे,
मक्कारों के वारे-न्यारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!
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रोटी-रोजी के संकट में, कुछ दूर देश में जाते हैं,
कहने को अपने सारे हैं, पर झूठे रिश्ते-नाते हैं,
सब स्वप्न हो गये अंगारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!
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टूटा तन-मन भी टूटा है, अभिलाषाएँ बस जिन्दा हैं,
आयेगीं जीवन में बहार, यह सोच-सोच शरमिन्दा हैं,
कब चमकेंगें नभ में तारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!
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वाह ...
जवाब देंहटाएंबहुत ही लाजवाब गीत ... व्यंग की तीखी धार ...
नव वर्ष की मंगल कामनाएं ...
जी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (30-12-2019) को 'ढीठ बन नागफनी जी उठी!' चर्चा अंक 3565 पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित हैं…
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रवीन्द्र सिंह यादव
सार्थक रचना
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंसादर