उस पर मैं कलम चलाऊँगा। दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं, आगे को बढ़ता जाऊँगा।। मैं कभी वक्र होकर घूमूँ, हो जाऊँ सरल-सपाट कहीं। मैं स्वतन्त्र हूँ, मैं स्वछन्द हूँ, मैं कोई चारण भाट नहीं। फरमाइश पर नहीं लिखूँगा, गीत न जबरन गाऊँगा। दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं, आगे को बढ़ता जाऊँगा।। भावों की अविरल धारा में, मैं डुबकी खूब लगाऊँगा। शब्दों की पतवार थाम, मैं नौका पार लगाऊँगा। घूम-घूम कर सत्य-अहिंसा की मैं अलख जगाऊँगा। दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं, आगे बढ़ता जाऊँगा।। चाहे काँटों की शय्या हो, या नर्म-नर्म हो सेज सजे। सारंगी का गुंजन सुनकर, चाहे ढोलक-मृदंग बजे। अत्याचारी के दमन हेतु, शिव का डमरू बन जाऊँगा। दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं, आगे बढ़ता जाऊँगा।। |
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नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (07-02-2022 ) को 'मेरी आवाज़ ही पहचान है गर याद रहे' (चर्चा अंक 4334) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। 12:01 AM के बाद प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।
चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
#रवीन्द्र_सिंह_यादव
बहुत बहुत सुन्दर रचना
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