बारिश-कुहरे से घिरा, पूरा उत्तर देश। नहीं बना मधुमास में, बासन्ती परिवेश।। -- नभ आँसू टपका रहा, सहमे रीति-रिवाज। बहुत विलम्बित हो रहा, ऐसे में ऋतुराज।। -- लौट-लौट कर आ रहा, हाड़ कँपाता शीत। मौसम ने छेड़ा नहीं, मनभावन संगीत।। -- शुरू हो रहा आज से, विश्व प्रणय सप्ताह। लेकिन मौसम कर रहा, सब अरमान तबाह।। -- प्रणय-निवेदन के लिए, मौसम है प्रतिकूल। उपवन में अब तक नहीं, खिले बसन्ती फूल।। -- सरसों फूली ही नहीं, हरे-हरे सब खेत। सुमनों बिन सूने पड़े, अब भी हृदय-निकेत।। -- पश्चिम की है सभ्यता, थोड़े दिन का प्यार। प्रणय-दिवस के बाद में, हो जाती तकरार।। -- |
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शास्त्री जी सादर नमस्कार कल आपने जब कविता लिखी थी तब मौसम बहुत खराब था लेकिन शायद आपके मन की आश भगवान के पास पहुँच गई और उन्हौने आपके मन की भावना को ध्यान में रखकर आज 7 ता. को ही मौसम खोल दिया है ।
जवाब देंहटाएंलगता है प्रभु ने सुनी, युवा मनों की बात।
इसीलिए मिटने लगा , अब कुहसे का पात।।
आज फरवरी माह का, सप्तम दिवस विशेष।
खिला हुआ मधुमास में, वासन्ती परिवेश।।
नभ ने आँसू पौछकर, गाया स्वागत गान।
ऋतुराज जय कार हो, स्वागत है श्रीमान।।
सूर्य देव की कृपा से, शीत हुआ भयभीत।
मौसम ने फिर से दिया, मनभावन संगीत।।
प्रणय निवेदन के लिए, मौसम अब अनुकूल।
खिलने होंगे अब शुरु भांति भांति के फूल।।
हटा गगन से चादरी, दिया नया संदेश।
वासंती मधुमास है, फाल्गुनी परिवेश।।
हृदय मिले हो तभी हो, पावन यह मधुमास।
नही बने यह वासना, करती हृदय उदास।।
ज्ञान सदा ही हृदय में, हों सदभाव निवास।
रविकर पश्चिम सभ्यता,करती सदा विनाश।।
आदरणीय रविकर जी के चरणों में यह पक्ति विन्यास समर्पित है। पुनः सादर प्रणाम रविकर जी
आयुर्वेदिक जानकारियों के लिए कृपया https://ayurvedlight.blogspot.com/ पर विजिट करें। इस साइट के सभी विजिटरों के लिए मेरी और से वसन्तपंचमी वसंतोत्सव की हार्दिक बधाई।
बहुत ही शानदार प्रस्तुति,सृजन के जवाब में सुंदर त्वरित रचना।
हटाएंमौसम से और प्रणय सप्ताह से खिन्न मन की उत्तम प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंसुंदर दोहा सृजन।
सादर।
बहुत सुंदर दोहे।
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