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गुरुवार, 6 अगस्त 2009

’’सूअर कौन?’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



मैं
गलियों
सड़कों
और
नालियों को
साफ करता हूँ,
गन्दगी को
चट कर जाता हूँ,
और
सूअर कहलाता हूँ,
परन्तु
आप तो
मुझको ही
चट कर जाते हो,
जी हाँ!
मैं सूअर हूँ,
और
आप..................?

23 टिप्‍पणियां:

  1. सूअर महोदय की शिकायत जायज लगती है. इसका निराकरण किया जाये.:)

    रामराम.

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  2. गज़ब का कविता लिखा है आपने! चंद लाइनों में आपने बड़े ही सुंदर रूप से सूअर के बारे में लिख डाला! बेचारा सूअर पुरी गंदगी को साफ़ करता है और लोग उसे खाते भी हैं!ऑस्ट्रेलिया में तो पोर्क और बीफ बहुत चलता है!

    जवाब देंहटाएं
  3. सुअर जी आपकी इस बात में तो बड़ा दम है.. हैपी ब्लॉगिंग.

    जवाब देंहटाएं
  4. बिना लाग-लपेट के सीधी मन को गुदगुदा देती है
    इतनी अच्छी व्यंग कविता कई दिनों बाद पढ़ी.
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  5. बेहतरीन --
    वाह --
    शब्दो से परे भाव --
    बहुत खूब

    जवाब देंहटाएं
  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  7. शास्त्री जी, इन सूरभक्षकों का अभी नामकरण किया जाना बाकी है:)

    जवाब देंहटाएं
  8. सूअर की शिकायत पर गौर किया जाये..!!

    जवाब देंहटाएं
  9. टिप्पणीदाताओं!
    आपकी सूअर के प्रति सम्वेदना देख्रकर
    मन अभिभूत हो गया है।
    आपकी टिप्पणियों के लिए
    आभार व्यक्त करता हूँ।

    जवाब देंहटाएं
  10. सही कह रहे हैं, सुअर सर!!

    जवाब देंहटाएं
  11. सूअर की शिकायत पर गौर किया जाये:())

    जवाब देंहटाएं

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