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शनिवार, 29 अगस्त 2009

’’बुज-दिली के मत निशान दो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


जिन्दा हो गर, तो जिन्दादिली का प्रमाण दो।
मुर्दों की तरह, बुज-दिली के मत निशान दो।।

स्वाधीनता का पाठ पढ़ाया है राम ने,
क्यों गिड़िगिड़ा रहे हो शत्रुओं के सामने,
अपमान करने वालों को हरगिज न मान दो।
मुर्दों की तरह, बुज-दिली के मत निशान दो।।

तन्द्रा में क्यों पड़े हो, हिन्द के निवासियों,
सहने का वक्त अब नही, भारत के वासियों,
सौदागरों की बात पर बिल्कुल न ध्यान दो।
मुर्दों की तरह, बुज-दिली के मत निशान दो।।

कश्मीर का भू-भाग दुश्मनों से छीन लो,
कैलाश-मानसर को भी अपने अधीन लो,
चीन-पाक को नही रज-कण का दान दो।
मुर्दों की तरह, बुज-दिली के मत निशान दो।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! क्या कहूं ? चंद अल्फाजो में ही आपने ढेर सारी बाते कह दी, शास्त्री जी ! बधाई !!काश, ये बुजदिल आपकी कविता पढ़ पाते !!!!

    जवाब देंहटाएं
  2. waah waah ..........aaj to veer ras chhalak chhalak ja raha hai..........ati sundar.

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर ढंग से आप ने देश के नोजवानो , ओर देश वासियो को एक संदेश दिया, काश इस देश को गर्त मै लेजाने वाले नेता आप की यह कविता पढ कर अकल से काम लेते...

    जवाब देंहटाएं
  4. ज़ोरदार ललकार है शास्त्रीजी! कैफी आज़मी की एक पंक्ति याद आती है :
    'कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले,
    उस इंक़लाब का, जो आज तक उधार-सा है !"
    बधाई !!

    जवाब देंहटाएं
  5. मुर्दों की तरह, बुज-दिली के मत निशान दो।।


    bahut sahi kaha hai aapne.........

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत तेजस्वी रचना. शायद आज हमें ऐसी ही रचनाओं की ज़रुरत है.

    जवाब देंहटाएं
  7. वाह वाह ! बहुत ही सुंदर देशप्रेम से भरी रचना!

    जवाब देंहटाएं
  8. कश्मीर का भू-भाग दुश्मनों से छीन लो,
    कैलाश-मानसर को भी अपने अधीन लो,

    DIL MEIN JOSH BHARTI ...... BAJUON KO FADKAATI LAJAWAAB RACHNA .......

    जवाब देंहटाएं

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