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शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

‘‘मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


आज फिर टिपियाने में गीत बन गया।


मखमली ख्वाब आखों में चलता रहा।

मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा।।


अश्क मोती से बन मुस्कुराने लगे,

मन में सोये सुमन खिलखिलाने लगे,

सुख सँवरता रहा, दर्द जलता रहा।

मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा।।


तुम जो ओझल हुए अटपटा सा लगा,

जब दिखाई दिये चटपटा सा लगा,

ताप बढ़ता रहा, तन सुलगता रहा।

मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा।।


उर के मन्दिर में ही प्रीत पलती सदा,

शैल-खिखरों से गंगा निकलती सदा,

स्वप्न मेरा हकीकत में ढलता रहा।

मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. भावनाओं का बहुत अच्छा प्रस्तुतीकरण.. हैपी ब्लॉगिंग

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह बहुत सुंदर. शुभकामनाएं.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर! मैं तो आपकी इस शानदार कविता को पड़कर निशब्द हो गई!

    जवाब देंहटाएं
  4. मखमली खाब आँ खों मे चलता रहा
    मन मृदु कोमल सा पिघलता रही बहुत सुन्दर भावनाओं से ओत प्रोत कविता है बधाई

    जवाब देंहटाएं
  5. अरे वाह, आपने तो सबके मन को पिघला दिया.

    जवाब देंहटाएं
  6. man mridul mom sa ban pighalta raha
    aap naino mein swapn ban palte rahe
    dil machalta raha,khwab mahakta raha
    saanjh dhalti rahi,shamma jalti rahi
    man mridul mom sa ban pighalta raha

    waah.......aaj to bahut hi sashakt prastutikaran hai.........dil ko choo gayi kavita.

    जवाब देंहटाएं
  7. उर के मन्दिर में ही प्रीत पलती सदा,
    शैल-खिखरों से गंगा निकलती सदा,
    स्वप्न मेरा हकीकत में ढलता रहा।
    मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा।।

    bahut pyare bhav badhai!

    जवाब देंहटाएं
  8. उर के मन्दिर में ही प्रीत पलती सदा,
    शैल-खिखरों से गंगा निकलती सदा,
    स्वप्न मेरा हकीकत में ढलता रहा।
    मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा।।

    वाह!! कितनी सहज और प्रभावशाली अभिव्यक्ति. साधू।

    जवाब देंहटाएं

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