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मंगलवार, 4 जनवरी 2022

कविता "खिल जायेंगे नव सुमन, उपवन मुस्कायेगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खिल जायेंगे नव सुमन,
उपवन मुस्कायेगा!!

कुहासे की चादर,
धरा पर बिछी हुई।
नभ ने ढाँप ली है,
अमल-धवल रुई।।

दिवस हैं छोटे,
रोशनी मन्द है।
शीत की मार है,
विद्यालय बन्द है।।

जल रहे हैं अलाव,
आँगन चौराहों पर।
चहल-पहल कम है,
पगदण्डी-राहों पर।।

सूरज अदृश्य है,
पड़ रहा पाला है।।
पर्वत ने ओढ़ लिया,
बर्फ का दुशाला है।।

मन में एक आशा है,
अब बसन्त आयेगा!
खिल जायेंगे नव सुमन,
उपवन मुस्कायेगा!!

2 टिप्‍पणियां:

  1. प्रकृति के बदलते स्वरुप का बहुत सुन्दर चिंत्रण
    दूर नहीं अब वसंत आने वाला है

    जवाब देंहटाएं
  2. 'मन में एक आशा है,
    अब बसन्त आयेगा!' .... बहुत खूब!
    सत्यतः कष्ट के क्षणों में आशा ही मनुष्य को जीवन्तता देती है।

    जवाब देंहटाएं

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