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रविवार, 9 जनवरी 2022

गीत "गाओ फिर से नया तराना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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गुजर गया है साल पुराना।
गाओ फिर से नया तराना।।
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सब कुछ तो पहले जैसा है,
लक्ष्य आज भी तो पैसा है,
सिर्फ कलेण्डर ही तो बदला,
वही ठौर है, वही ठिकाना।
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नित्य नये अनुभव होते हैं,
कुछ हँसते हैं, कुछ रोते हैं,
जीवन तो बस एक सफर है,
सबको पड़ता आना-जाना।
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पीना पड़ा यहाँ गरल है,
शंकर बनना नहीं सरल है,
कैसे महादेव बन जायें?
मुश्किल गंगा धार बहाना।
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आपाधापी, भाग-दौड़ है,
गुणा-भाग है और जोड़ है,
इक आता है, इक जाता है,
जग है एक मुसाफिरखाना।
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लोग मील के पत्थर जैसे,
अपनी मंजिल पायें कैसे?
औरों को पथ बतलाते हैं,
ये क्या जानें कदम बढ़ाना।
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2 टिप्‍पणियां:

  1. सब कुछ तो पहले जैसा है,
    लक्ष्य आज भी तो पैसा है,
    सिर्फ कलेण्डर ही तो बदला,
    वही ठौर है, वही ठिकाना।

    सुंदर गीत...

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह! नए वर्ष के बहाने जीवन का फ़लसफ़ा

    जवाब देंहटाएं

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