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रविवार, 24 मई 2009

‘‘अभिनव संसार बसाया क्यों?’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जब मन में विश्वास नहीं था, मुझको यार बनाया क्यों?
अपने नयनों के प्यालों में, अभिनव संसार बसाया क्यों??

दुनियादारी में पड़ करके, कुछ रीत निभाई जाती हैं,
मन्दिर में मूरत गढ़ करके ही, प्रीत दिखाई जाती है,
छल-छद्म,प्रपंच चला करके, गन्दा व्यापार रचाया क्यों?
अपने नयनों के प्यालों में, अभिनव संसार बसाया क्यों?

मैंने स्वर भर-भर कर गाया, तुमको अपने सब गानों में,
लेकिन तुम उलझे थे केवल, सुख के ही मधुर तरानों मे,
नौसिखिये नाविक के हाथों मे, फिर पतवार थमाया क्यों?
अपने नयनों के प्यालों में, अभिनव संसार बसाया क्यों??

झूठे वादे, मलिन इरादे, झूठा सब अपनापन था,
स्वार्थसिद्ध करने भर को ही, प्रेम तुम्हारा अनुपम था,
आगा-पीछा बिन सोचे ही, अपना घर-द्वार सजाया क्यों?
अपने नयनों के प्यालों में, अभिनव संसार बसाया क्यों??

3 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेम को अंधा तभी तो कहते हैं कि उसकी असलियत समय निकलने के बाद ही पता चलती है । तब तो आँखों पर परदा ही पडा रहता है ।

    जवाब देंहटाएं
  2. प्रेम संसार बसाने में आजतक किसने आगा पीछा सोचा है!!

    जवाब देंहटाएं

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