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सोमवार, 4 मई 2009

‘‘नियति’’ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’


जहाँ न पहुँचे रवि,

वहाँ पहुँचे कवि,

इस उक्ति को

यदि सत्य मान लें,

तो इतना भी जान लें,

कवि ही

समाजरूपी भवन का

सुदृढ़ स्तम्भ है,

कवि ही

संस्कृति का आलम्ब है,

क्योंकि,

आज का समाज है

एक जर्जर समाज,

इसके अनोखे हैं ढंग,

इसीलिए तो बदरंग हैं

कविता के रंग,

विलुप्त हो गई है

गति और यति

शायद इसकी

यही है नियति।


7 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. बहुत सही कहा आपने .. सुंदर रचना के लिए बधाई।

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  3. bilkul sahi farmaya aapne.niyati ko shayad kavi hi badal sakta hai.

    जवाब देंहटाएं
  4. कलियुग में और हो भी क्या सकता है?

    सूर सूर, तुलसी ससी, अडुगन केशवदास।
    अब के कवि खद्योत सम, जहँ-तहँ करत प्रकाश।।

    जवाब देंहटाएं
  5. अति उत्तम!
    आपका लेख प्रशंशा योग्य है!
    अच्चा.. क्या आप मुझे ये बता सकते हैं कि मै अपने द्वारा बनाये गए animation और videos किस प्रकार से चिठ्ठाजगत के माध्यम से लोगो तक पंहुचा सकता हूँ?
    उदहारण के लिए: http://kikorinakori.blogspot.com/2009/03/thande-thande-paani-se.html

    जवाब देंहटाएं

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