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बुधवार, 27 मई 2009

‘‘कौआ’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


कौआ बहुत सयाना होता।

कर्कश इसका गाना होता।।

पेड़ों की डाली पर रहता।

सर्दी, गर्मी, वर्षा सहता।।

कीड़े और मकोड़े खाता।

सूखी रोटी भी खा जाता।।

सड़े मांस पर यह ललचाता।

काँव-काँव स्वर में चिल्लाता।।

साफ सफाई करता बेहतर।

काला-कौआ होता मेहतर।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

12 टिप्‍पणियां:

  1. इतना काम कर गया और मेहतर कह रहे हैं. :)

    जवाब देंहटाएं
  2. अच्छा ही है कि
    कौआ कोई व्यक्ति विशेष नहीं है ... ... .

    जवाब देंहटाएं
  3. इतना नहीं उपयोग इसका
    कुछ और भी बढ़ा है
    कवि से कविताई करवाता
    कोयल से तुलना में आता
    कालों और धूर्तों का है महाराजा
    लोमड़ी का भी है बजाता बाजा

    जवाब देंहटाएं
  4. सयाने कौवे से रू-ब-रू होना ख़ला बहुत!

    जवाब देंहटाएं
  5. अच्छा है कि मेरे मित्र को कौआ-कौआ ही नजर आ रहा है।

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सही जी..कौवे मे बहुत सारे अनुकरणीय गुण भी होते हैं जैसे काक चेष्टा..

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  7. बड़े भाई ,
    बहुत सुन्दर रचना .

    कौआ बहुत सयाना होता।
    कर्कश इसका गाना होता।।

    जवाब देंहटाएं
  8. कोऐं की फोटो भी बहुत सुन्दर लगी..

    बड़े काम का कोआ भाई, बडे काम का कोआ
    मेहमान जब घर आते
    मुडे़र पर जाता कोआ..
    उनके आने की खबर वो
    उनसे पहले दे जाता
    बडे़ काम का कोआ भाई. बडे़ का्म का..

    लो आपकी कविता पढ़ कुछ हाथ हमने भी चला दिये..

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत बडिया बाल गीत है एक कम तो किसी ने नहीं गिनवाया कि
    जब ये काँव काँव चिल्लाता है
    तो घर मे महमान आता है
    और
    उड काले कागा क्या संदेशा लाये
    मीठी चूरी लाऊँ जो मेरे साजन आये

    जवाब देंहटाएं
  10. साफ सफाई करता बेहतर।
    काला-कौआ होता मेहतर।।

    कौवे की कहानी लाजवाब है........ सच में ये सफाई तो बहुत करते हैं .........

    जवाब देंहटाएं
  11. क्या बात है ! मगर अब हमारे विकास का असर कौवों की संख्या पर भी पड़ता नजर आ रहा है.

    जवाब देंहटाएं
  12. sabne itna kuch likh diya uske baad kahne ko sirf yahi bachta hai........bahut badhiya likha aapne aaj to kauve ka bhi maan badha diya.

    जवाब देंहटाएं

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