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रविवार, 3 मई 2009

"!पुकार!" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


तुम्हीं वन्दना, तुम्ही साधना।

छन्दों को अब तुम्हीं बाँधना।


प्रेम सुधा सरसाने वाली,

मन को अति हर्षाने वाली,

सपनों में आ जाने वाली,

मेघा बन छा जाने वाली,

जीवन को महकाने वाली,

वाणी को चहकाने वाली,


तुम्हीं वन्दना, तुम्ही साधना।

छन्दों को अब तुम्हीं बाँधना।

सत्य बोलने का बल देना,

अपनी भक्ति अविरल देना,

दुष्ट-दलालों को दल देना,

शब्दों का मुझको हल देना,

मेहनत का मुझको फल देना,

अमृत सा मुझको जल देना,

तुम्हीं वन्दना, तुम्ही साधना।

छन्दों को अब तुम्हीं बांधना

12 टिप्‍पणियां:

  1. दुष्ट-दलालों को दल देना,

    शब्दों का मुझको हल देना,

    मेहनत का मुझको फल देना,

    अमृत सा मुझको जल देना,
    sunder prarthana devi ki khubsurat mann prasanna hua padhke.

    जवाब देंहटाएं
  2. pukar ho to aisi jo dil se nikli ho aur ismein to aap mahir hain.aapki pukar to jaroor kabool hogi.aap mata ke ananya bhakt hain.

    जवाब देंहटाएं
  3. जब प्रार्थना दिल से की गई है, तो सुनी भी जायेगी . सुन्दर रचना..

    जवाब देंहटाएं
  4. मधुर प्रार्थना है आपकी रचना.............दिल को सुकून मिल जता है आपके ब्लॉग पर

    जवाब देंहटाएं
  5. Sir ji.
    Aap bahut achcha likhten hai.
    ma saraswati ki vandana bahut
    achchhi hai.
    badhai.

    जवाब देंहटाएं
  6. बेहतरीन नज्म।
    मुबारकवाद।

    जवाब देंहटाएं
  7. वाह शास्त्री जी।
    बहुत सुन्दर वन्दना प्रस्तुत की है।

    जवाब देंहटाएं
  8. सुंदरतम प्रार्थना की आपने. शुभकामनाएं.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  9. sunder prarthna ke liye badhai sweekaren. dhanyawaad.

    जवाब देंहटाएं

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