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शुक्रवार, 22 मई 2009

‘‘टिप्पणी या कविता्’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जिसने कभी नही पाया, ममता का गहरा सागर।

सूनी होगी चादर, सूखी सी होगी उसकी गागर।।

मधुवन में मधुमास नही, पतझड़ उसको मिलते होंगे।

उसके जीवन में खुशियों के, फूल कहाँ खिलते होंगे।।

ममता की जब छाँव नही, अमृत भी गरल सने होंगे।

आशाएँ सब सूनी होंगी, पथ सब विरल घने होंगे।।

कृष्ण-कन्हैया को द्वापर में, मिला यशोदा का आँचल।

कलयुग में क्या मिल पायेगा, ऐसी माता का आँचल।।

हे प्रभो! बालक दो तो उसको, माता की छाया देना।

माँ को पास बुलाते हो तो, शिशु को मत काया देना।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. हे प्रभो! बालक दो तो उसको, माता की छाया देना।
    माँ को पास बुलाते हो तो, शिशु को मत काया देना।।
    बहुत ही सुन्दर रचना

    जवाब देंहटाएं
  2. भावपूर्ण पंक्तियाँ हैं। वाह।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर शाश्त्री जी, नमन आपको.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  4. भावुक कविता.. ईश्वर कभी किसी को ममता से महरूम नहीं रखे

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत बढिया लिखा है .. सुंदर रचना।

    जवाब देंहटाएं
  6. सच है, बिन माता के
    जीवन सूना-सूना रहता है!
    बिन माँ के हँस लें कितना भी
    अंतर्मन तो रोता है!

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत ही भावपूर्ण रचना है, शास्त्री जी.

    जवाब देंहटाएं

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