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रविवार, 17 मई 2009

"सबका बस ये ही है रोना" डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

प्रेम-रोग में गम का होना,

सबका बस ये ही है रोना।


क्रम ऐसा ही चलता रहता,

जीवन यों ही ढलता रहता,

खारे आँसू का जल पीना,

हरदम सपनों में ही खोना।

प्रेम-रोग में गम का होना,

सबका बस ये ही है रोना।


होली हो या हो दीवाली,

पतझड़ हो या हो हरियाली,

घुट-घुट कर पड़ता है जीना,

भार कठिन है अपना ढोना।

प्रेम-रोग में गम का होना,

सबका बस ये ही है रोना।


कागा बोले कोयल बोले,

कड़ुआ बोले या रस घोले,

उनके बिन लगता सब सूना,

खाली है मन का हर कोना।

प्रेम-रोग में गम का होना,

सबका बस ये ही है रोना।


भूखी अँखिया प्यासी अँखिया,

चंचल शोख उदासी अँखिया,

अक्सर अक्स उभर आता है,

बनकर मीठा स्वप्न सलोना।

प्रेम-रोग में गम का होना,

सबका बस ये ही है रोना।

8 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी कविता.
    प्रेम रोग के ग़म का आनंद ही तो उसका प्राप्य है.

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही अच्छी कविता..प्रेम में तो गम.. ही मिलते है...और कुछ नहीं..

    जवाब देंहटाएं
  3. बिना गम के कैसा प्रेम रोग?

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  4. प्रेम-रोगियों को बुरा लग सकता है!

    कोई प्रेम-रोगी टिप्पणी करके बताए -

    क्या मैं ग़लत कह रहा हूँ?

    जवाब देंहटाएं
  5. डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’" जी
    अभिवंदन
    आपकी रचना ""सबका बस ये ही है रोना" पढ़ी बहुत अच्छी लगी.
    हृदय को अपनी सी लगी
    अक्सर अक्स उभर आता है,बनकर मीठा स्वप्न सलोना
    - विजय

    जवाब देंहटाएं
  6. प्रेम रोग में गम का होना....
    ये तो होता ही है...।
    अच्छी रचना।

    जवाब देंहटाएं
  7. prem rog aisa hi hota hai.......aur wo rog hi kya jo rulaye nhi.........phir ye to prem rog hai.

    जवाब देंहटाएं

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