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शनिवार, 30 मई 2009

‘‘सेल-फोन (मोबाइल)’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)


पापा ने दिलवाया मुझको,

सेल-फोन इक प्यारा सा।

मन-भावन रंगों वाला,

यह एक खिलौना न्यारा सा।।

रोज सुबह को मुझे जगाता,

मोबाइल कहलाता है।

दूर-दूर तक बात कराता,

सही समय बतलाता है।।

नम्बर डायल करो कहीं भी,

पता-ठिकाना बतलाओ।

मुट्ठी में इसको पकड़ो और,

संग कही भी ले जाओ।।

इससे नेट चलाओ चाहे,

बात करो दुनिया भर में।

यह सबके मन को भाता है,

लोकलुभावन घर-घर में।।

बटन दबाते ही मोबाइल,

काम टार्च का देता है।

पलक झपकते ही यह सारा,

अंधियारा हर लेता है।।

सेल-फोन इस युग का,

इक छोटा सा है कम्प्यूटर।

गुणा-भाग करने वाला,

बन जाता कैल-कुलेटर।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

8 टिप्‍पणियां:

  1. बड़े भाई
    मोबाइल पर रचना कमाल की .बधाई.

    जवाब देंहटाएं
  2. इस तरह की रचनायें मुझे बहुत भाती हैं
    अपने बीते बचपन की याद दिलाती हैं

    जवाब देंहटाएं
  3. aapne to mobile ki sari khoobiyan gina di.bahut badhiya.

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही अच्‍छी रचना ।

    जवाब देंहटाएं
  5. मोबाईल पुराण बहुत सुन्दर लगा बधाइ

    जवाब देंहटाएं
  6. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  7. सुंदर रचना!

    आजकल बच्चों का
    सबसे प्यारा खिलौना
    मोबाइल ही है!

    जवाब देंहटाएं

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