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गुरुवार, 28 मई 2009

‘‘मदारी का खेल’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



देखो एक मदारी आया।

अपने संग लाठी भी लाया।।

डम-डम डमरू बजा रहा है।

भालू, बन्दर नचा रहा है।।

लम्बे काले बालों वाला।

भालू का अन्दाज निराला।।

खेल अनोखे दिखलाता है।

बच्चों के मन को भाता है।।

वानर है कितना शैतान।


पकड़ रहा भालू के कान।।

यह अपनी धुन में ऐँठा है।

भालू के ऊपर बैठा है।।

लिए कटोरा पेट दिखाता।

माँग-माँग कर पैसे लाता।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

8 टिप्‍पणियां:

  1. चित्र के साथ यह बाल कविता एक सार्थक प्रयास है। बच्चे ज्यादा आनन्द लेंगे।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह जी बहुत लाजवाब. आप्ने तो बचपन की यादें ताजा करदी.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  3. बच्चों का मन रिझानेवाली बहुत सुंदर कविता!

    जवाब देंहटाएं
  4. यह तो याद रहने वाली चीज है !

    जवाब देंहटाएं
  5. शास्त्री जी............एक और अच्छी कविता ............बच्चे आपकी कविता आनंद लेकर पढ़ते हैं

    जवाब देंहटाएं

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