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शुक्रवार, 8 मई 2009

निवेदन (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री‘मयंक’)

प्रिय ब्लागर मित्रों!

रिश्तेदारी निभाने के लिए एक सप्ताह के लिए सुदूर स्थान पर जा रहा हूँ।

इस अवधि में मेरी रचनाएँ तो मेरे ब्लाग पर प्रकाशित होती ही रहेंगी।

परन्तु चाह कर भी आपकी रचनाएँ पढ़ने को नही मिलेंगी।

आशा ही नही आप सबका स्नेह व प्यार मुझे पूर्ववत् मिलता रहेगा।

तुम्हारी याद को लेकर, बड़ी ही दूर आये हैं।

छिपाकर अपनी आँखों में तुम्हारा नूर लाये हैं।

लबों पर प्यास आयी तो, तुम्हारे जाम पाये हैं।

लिखाकर तन-बदन में, हम तुम्हारा नाम लाये हैं।

14 टिप्‍पणियां:

  1. अच्‍छा है .. आपकी रचनाएं पढने को मिलती ही रहेंगी .. आपका इंतजार रहेगा यहां।

    जवाब देंहटाएं
  2. निभा आईये रिश्तेदारी...इन्तजार करेंगे.

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी यात्रा शुभ हो. आराम से रिश्तेदारी निभा आईये. यहां का काम हम संभाल लेंगे.:)

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  4. कोई बात नहीं.. एक सप्ताह बाद सही.. आपको पढ़ते रहेगें

    जवाब देंहटाएं
  5. सामाजिक दायित्व का निर्वहन भी अत्यंत आवश्यक है.आपकी यात्रा के लिये शुभकामनायें.

    जवाब देंहटाएं
  6. रिश्तेदारी ही सही इसी बहाने छुट्टियों का आनंद लिजिये। आपकी यात्रा शुभ हो।

    जवाब देंहटाएं
  7. आपकी छुट्टियां आनंदप्रद हों.. आभार

    जवाब देंहटाएं
  8. mayank ji ..aapki rachnaye padi bahot aanand aaya.... Rishtedaro ka bhi hum pe haq hota he...apna haq aada kijiye.

    जवाब देंहटाएं
  9. aapko yatra ki shubhkamnayein........rishtedari nibhani bhi jaroori hoti hai........bahut hi khoobsoorat alfaz....tumhari yaad ko lekar...........bahut badhiya.

    जवाब देंहटाएं
  10. कोई बात नहीं शास्त्री जी,
    आप अपना धर्म निभाएं हम अपना निभाएंगे

    जवाब देंहटाएं
  11. आपके लौट कर आने की प्रतीक्षा रहेगी

    जवाब देंहटाएं
  12. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  13. जाते-जाते
    आप आपनी इन चार पंक्तियों से
    मेरे "सुमन" में
    चार चाँद लगा गए!

    जवाब देंहटाएं
  14. मुझे भी
    अपनी एक कविता की
    ये पंक्तियाँ याद आ गईं -

    एक याद ही ऐसी है,
    जो आती नहीं तुम्हारी!
    आए भी वो कैसे,
    तुम्हें हम भूलते कब हैं!

    जवाब देंहटाएं

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