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सोमवार, 18 मई 2009

"शिक्षित-बेकारों का दामन, रोजगार से भरना होगा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



जो कमजोर वजीरे-आजम की, स्वर लहरी बोल रहे थे।

शासन स्वयं चलाने को, मुँह में रसगुल्ले घोल रहे थे।।


उनको भारत की जनता ने, सब औकात बता डाली है।

कितनों की संसद में जाने की, अभिलाष मिटा डाली है।।



मनसूबे सब धरे रह गये, सपने चकनाचूर हो गये।

आशा के विपरीत, मतों को पाने को मजबूर हो गये।।



फील-गुड्ड के नारे को तो, पहले ही ठुकरा डाला था।

अब भी नही निवाला खाया, जो चिकना-चुपड़ा डाला था।।



माया का लालच भी जन, गण, मन को, कोई रास न आया।

लालू-पासवान के जादू ने, कुछ भी नही असर दिखाया।।



जिसने जूता खाया, उसको हार, हार का हार मिला है।

पाँच साल तक घर रहने का, बदले में उपहार मिला है।।



लोकतन्त्र के महासमर में, असरदार सरदार हुआ है।

ई.वी.एम. के भवसागर में, फिर से बेड़ा पार हुआ है।।


जनता की उम्मीदों पर, अब इनको खरा उतरना होगा।

शिक्षित-बेकारों का दामन, रोजगार से भरना होगा।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. फील-गुड्ड के नारे को तो, पहले ही ठुकरा डाला था।
    अब भी नही निवाला खाया,जो चिकना-चुपड़ा डाला था।।
    जिसने जूता खाया,उसको हार,हार का हार मिला है।पाँच साल तक घर रहने का, बदले में उपहार मिला है।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह शास्त्री जी...........
    नेताओं को भी अच्छा धोया है आपने........
    मजा आ गया

    उत्तर देंहटाएं
  3. भाई प्रेम फर्रूखाबादी जी।
    अपनी टिप्पणी मैं कुछ कहो तो सही।
    आपने तो मेरा ही छंद दुहरा दिया है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत करारा व्यंग्य रचा है,
    बहुत करारी हार पर!

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही बढ़िया। बस नेताओं को अब तो जनता की सुननी ही होगी।

    उत्तर देंहटाएं

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