"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

फ़ॉलोअर

शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

दोहागीत "फीके हैं त्यौहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दोहा गीत
--
बात-बात पर हो रही, आपस में तकरार।
भाई-भाई में नहीं, पहले जैसा प्यार।।
(१)
बेकारी में भा रहा, सबको आज विदेश।
खुदगर्ज़ी में खो गये, ऋषियों के सन्देश।।
कर्णधार में है नहीं, बाकी बचा जमीर।
भारत माँ के जिगर में, घोंप रहा शमशीर।।
आज देश में सब जगह, फैला भ्रष्टाचार।
भाई-भाई में नहीं, पहले जैसा प्यार।।
(२)
आपाधापी की यहाँ, भड़क रही है आग।
पुत्रों के मन में नहीं, माता का अनुराग।।
बड़ी मछलियाँ खा रहीं, छोटी-छोटी मीन।
देशनियन्ता पर रहा, अब कुछ नहीं यकीन।।
छल-बल की पतवार से, कैसे होंगे पार,
भाई-भाई में नहीं, पहले जैसा प्यार।।
(३)
ओढ़ लबादा हंस का, घूम रहे हैं बाज।
लूट रहे हैं चमन को, माली ही खुद आज।।
खूनी पंजा देखकर, सहमे हुए कपोत।
सूरज अपने को कहें, ये छोटे खद्योत।।
मन को अब भाती नहीं, वीणा की झंकार।
भाई-भाई में नहीं, पहले जैसा प्यार।।
(४)
जब हो सबका साथ तो, आता तभी विकास।
महँगाई के दौर में, टूट रही है आस।।
कोरोना ने हर लिया, जीवन का सुख-चैन।
समय पुराना खोजते, लोगों के अब नैन।।
आशाएँ दम तोड़ती, फीके हैं त्यौहार।
भाई-भाई में नहीं, पहले जैसा प्यार।।
(५)
कुनबेदारी ने हरा, लोकतन्त्र का 'रूप'।
आँगन में आती नहीं, सुखद गुनगुनी धूप।।
दल-दल के अब ताल में, पसरा गया है पंक।
अब वो ही राजा हुए, कल तक थे जो रंक।।
जन-जन का हो उन्नयन, मन में यही विचार।
भाई-भाई में नहीं, पहले जैसा प्यार।।
-- 

10 टिप्‍पणियां:


  1. जय मां हाटेशवरी.......

    आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
    आप की इस रचना का लिंक भी......
    21/02/2021 रविवार को......
    पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
    शामिल किया गया है.....
    आप भी इस हलचल में. .....
    सादर आमंत्रित है......


    अधिक जानकारी के लिये ब्लौग का लिंक:
    https://www.halchalwith5links.blogspot.com
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी विचारणीय दोहा गीत प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (२१-०२-२०२१) को 'दो घरों की चिराग होती हैं बेटियाँ' (चर्चा अंक- ३९८४) पर भी होगी।

    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  4. बेकारी में भा रहा, सबको आज विदेश।
    खुदगर्ज़ी में खो गये, ऋषियों के सन्देश।।
    कर्णधार में है नहीं, बाकी बचा जमीर।
    भारत माँ के जिगर में, घोंप रहा शमशीर।।

    यथार्थ को प्रतिबिंबित करता गीत...।
    नमन आदरणीय 🙏
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  5. देश,परिवार तथा समाज के प्रति हर इंसान के कुछ महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व होते हैं, परंतु जब आँखों के सामने उनका क्षरण होता है, तो स्वाभाविक रूप से मन आहत होता है ..यथार्थपूर्ण सार्थक दोहे..

    जवाब देंहटाएं
  6. पारिवारिक और सामाजिक परिवेश पर सटीक लिखा है ।विचारणीय

    जवाब देंहटाएं
  7. हमेशा की तरह सुंदर सृजन सर,सादर नमन आपको

    जवाब देंहटाएं
  8. सीख देते सुंदर दोहे ।
    यथार्थ पर खूब कलम चलती है आपकी आदरणीय।
    सुखद।

    जवाब देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails