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सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

दोहे "सहमा हुआ पहाड़" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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दरक रहे हैं ग्लेशियर, सहमा हुआ पहाड़।
अच्छा होता है नहीं, कुदरत से खिलवाड़।।
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प्रान्त उत्तराखण्ड में, सहम गये हैं लोग।
हठधर्मी विज्ञान की, आज रहे हम भोग।।
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कुदरत के परिवेश से, जब-जब होती छेड़।
देवताओं के कोप से, होती तब मुठभेड़।।
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कृत्रिम बाँध खुदान से, शैल हुए हैं नग्न।
सरकारी फरमान से, टिहरी जल में मग्न।।
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शिव करते जब ताण्डव, होता बहुत विनाश।
रोता है संसार तब, हँसता है आकाश।।
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हिमगिरि से हिम टूट कर, गया जिन्दगी लील।।
आज तपोवन में बनी, गंगा गहरी झील।।
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अगर सुन सको तो सुनो, निर्दोषों की चीख।
कुदरत के सन्देश से, ले लो कुछ तो सीख।।
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7 टिप्‍पणियां:

  1. पर्यावरण से खिलवाड़ की भारी कीमत मानव को चुकानी पड़ रही है

    जवाब देंहटाएं
  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (9-2-21) को "मिला कनिष्ठा अंगुली, होते हैं प्रस्ताव"(चर्चा अंक- 3972) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  3. Ye vastvikta he. aapne bilkul sahi baat batai he. Saabhar Shastri ji

    जवाब देंहटाएं
  4. लालच की हवस में इंसान अपनी ही जान लेता जा रहा है

    जवाब देंहटाएं
  5. दरक रहे हैं ग्लेशियर, सहमा हुआ पहाड़।
    अच्छा होता है नहीं, कुदरत से खिलवाड़।।
    --
    प्रान्त उत्तराखण्ड में, सहम गये हैं लोग।
    हठधर्मी विज्ञान की, आज रहे हम भोग।।

    आदरणीय, दोहों के माध्यम से आपने यथार्थ का जो चित्रण किया है, वह श्लाघनीय है।
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  6. सामायिक विषय! पर्यावरण से खिलवाड़ के दुष्परिणाम दर्शाते सटीक दोहे।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं

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