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सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

कविता "माता का करता हूँ वन्दन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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हीं जानता कैसे बन जाते हैं
,
मुझसे गीत-गजल।
जाने कब मन के नभ पर,
छा जाते हैं गहरे बादल।।
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ना कोई कॉपी ना कागज,
ना ही कलम चलाता हूँ।
खोल पेज-मेकर को,
हिन्दी टंकण करता जाता हूँ।।
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देख छटा बारिश की,
अंगुलियाँ चलने लगतीं है।
कम्प्यूटर देखा तो उस पर,
शब्द उगलने लगतीं हैं।।
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नजर पड़ी टीवी पर तो,
अपनी हरकत कर जातीं हैं।
चिड़िया का स्वर सुन कर,
अपने करतब को दिखलातीं है।।
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बस्ता और पेंसिल पर,
उल्लू बन क्या-क्या रचतीं हैं।
सेल-फोनतितली-रानी,
इनके नयनों में सजतीं है।।
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कौआभँवरा और पतंग भी,
इनको बहुत सुहाती हैं।
नेता जी की टोपी,
श्यामल गैया बहुत लुभाती है।।
--
सावन का झूला हो,
चाहे होली की हों मस्त फुहारें।
जाने कैसे दिखलातीं ये,
बाल-गीत के मस्त नजारे।।
--
मैं तो केवल जाल-जगत पर,
इन्हें लगाता जाता हूँ।
क्या कुछ लिख मारा है,
मुड़कर नही देख ये पाता हूँ।।
--
जिन देवी की कृपा हुई है,
उनका करता हूँ वन्दन।
सरस्वती माता का करता,
कोटि-कोटि हूँ अभिनन्दन।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (16-2-21) को "माता का करता हूँ वन्दन"(चर्चा अंक-3979) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  2. माता सरस्वती के चरणों में नतमस्तक हूं...

    आदरणीय शास्त्री जी,
    वसंतपंचमी एवं सरस्वती पूजन की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
    बहुत सुंदर रचना प्रस्तुति है..। बहत बधाई !

    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  3. माँ सरस्वती का मान गुणगान करती सुन्दर रचना ...

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह वाह
    बहुत सुंदर सृजन

    सादर

    जवाब देंहटाएं
  5. ..माँ सरस्वती को समर्पित सुन्दर रचना..

    जवाब देंहटाएं
  6. आदरणीय / प्रिय,
    कृपया इस लिंक पर पधारें... इसमें आपके दोहे भी शामिल हैं। धन्यवाद 🙏

    दोहाकारों की दृष्टि में वसंत

    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं

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