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सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

गीत "सत्य-अहिंसा की मैं अलख जगाऊँगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--
जो मेरे मन को भायेगा
,
उस पर मैं कलम चलाऊँगा।
दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,
आगे को बढ़ता जाऊँगा।।
--
मैं कभी वक्र होकर घूमूँ,
हो जाऊँ सरल-सपाट कहीं।
मैं स्वतन्त्र हूँमैं स्वछन्द हूँ,
मैं कोई चारण भाट नहीं।
फरमाइश पर नहीं लिखूँगा,
गीत न जबरन गाऊँगा।
दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,
आगे को बढ़ता जाऊँगा।।
--
भावों की अविरल धारा में,
मैं डुबकी खूब लगाऊँगा।
शब्दों की पतवार थाम,
मैं नौका पार लगाऊँगा।
घूम-घूम कर सत्य-अहिंसा
 की मैं अलख जगाऊँगा।
दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,
आगे बढ़ता जाऊँगा।।
--
चाहे काँटों की शय्या हो,
या नर्म-नर्म हो सेज सजे।
सारंगी का गुंजन सुनकर,
चाहे ढोलक-मृदंग बजे।
अत्याचारी के दमन हेतु,
शिव का डमरू बन जाऊँगा।
दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,
आगे बढ़ता जाऊँगा।।
--

9 टिप्‍पणियां:

  1. --
    चाहे काँटों की शय्या हो,
    या नर्म-नर्म हो सेज सजे।
    सारंगी का गुंजन सुनकर,
    चाहे ढोलक-मृदंग बजे।
    अत्याचारी के दमन हेतु,
    शिव का डमरू बन जाऊँगा।
    दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,
    आगे बढ़ता जाऊँगा।।..सुन्दर सारगर्भित संदेश भरी रचना..

    जवाब देंहटाएं
  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (23-2-21) को 'धारयति इति धर्मः'- (चर्चा अंक- 3986) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  3. अत्याचारी के दमन हेतु,
    शिव का डमरू बन जाऊँगा।
    दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,
    आगे बढ़ता जाऊँगा।।

    हृदयग्राही गीत...
    साधुवाद आदरणीय 🙏

    जवाब देंहटाएं
  4. अत्यन्त प्रेरक एवं प्रभावशाली गीत । अभिनंदन ।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर गीत आदरणीय! स्वांत सुखांत जग हिताय लिखने का सुंदर आह्वान।
    बहुत ओजमई रचना।

    जवाब देंहटाएं
  6. चाहे काँटों की शय्या हो,
    या नर्म-नर्म हो सेज सजे।
    सारंगी का गुंजन सुनकर,
    चाहे ढोलक-मृदंग बजे।
    अत्याचारी के दमन हेतु,
    शिव का डमरू बन जाऊँगा।

    मार्गदर्शक की भांति प्रेरणादाई रचना।
    सादर नमन।

    जवाब देंहटाएं

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